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बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

ब्राह्मण को जानना चाहतें हैं ? तो जरुर पढ़ें.......

ब्राह्मण को जानना चाहता है ? मैं तुझे बताता हूँ कि ब्राह्मण को जानना चाहता है?मैं तुझे बताता हूँ कि ब्राह्मण कौन है।

ब्राह्मण वह है जो वशिष्ठ के रूप में केवल अपना एक दंड जमीन में गाड़ देता है,जिससे विश्वामित्र के समस्त अस्त्र शस्त्र चूर हो जाते हैं और विश्वामित्र लज्जित होकर कह पड़ते हैं-
धिक बलं क्षत्रिय बलं,ब्रह्म तेजो बलं बलं।
एकेन ब्रह्म दण्डेन,सर्वस्त्राणि हतानि में।
(क्षत्रिय के बल को धिक्कार है।ब्राह्मण का तेज ही असली बल है।ब्राह्मण वशिष्ठ का एक ब्रह्म दंड मेरे समस्त अस्त्र शस्त्र को निर्वीर्य कर दिया)

ब्राह्मण वह है जो परशुराम के रूप में एक बार नहीं,21 बार आततायी राजाओं का संहार करता है।जिसके लिए भगवान राम भी कहते हैं-

विप्र वंश करि यह प्रभुताई।
अभय होहुँ जो तुम्हहिं डेराई।
जिनके विषय मे यह श्लोक प्रसिद्ध है-

अग्रतः चतुरो वेदाः पृष्ठतः सशरं धनुः ।
इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ।।

चार वेद मौखिक हैं अर्थात् पूर्ण ज्ञान है एवं पीठपर धनुष-बाण है, अर्थात् शौर्य है,अर्थात् यहां ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेज, दोनों हैं । जो कोई इनका विरोध करेगा, उसे शाप देकर अथवा बाणसे परशुराम पराजित करेंगे । ऐसी उनकी विशेषता है ।

ब्राह्मण वह है,जो दधीचि के रूप में अपनी हड्डियों से बज्र बनवाकर,वृत्तासुर का अंत कराता है।जब तक धरती है,इतिहास मिट नहीं सकता-

ठीक है, ये प्राण क्षण-भंगुर हमारे,
किन्तु फिर भी हैं सभी को प्राण प्यारे।
मृत्यु का भय तो सभी को दाहता है,
तुम बताओ कौन मरना चाहता है?
किन्तु घबराओ नहीं, मैं प्राण दूँगा,
मृत्यु-भय से तर्क का आश्रय न लूँगा।
स्वार्थ है इसमें तुम्हारा जानता हूँ,
किन्तु यह परमार्थ भी है, मानता हूँ।
यों तुम्हें लज्जित किया, मत मान लेना,
भाव हैं सच्चे हृदय के जान लेना।
सोचता हूँ जन्म का उद्देश्य क्या है?
किस लिए पैदा हुआ हूँ क्या किया है?
बहुत वर्षों साधना की, ज्ञान पाया,
किन्तु लगता व्यर्थ ही जीवन गँवाया।
आज अपने पास देखी मृत्यु छाया,
और सच्चे ज्ञान का आभास पाया।
विश्व, वैभव, मान-यश ले क्या करूंगा?
सब मिलेगा किन्तु फिर भी तो मरूंगा।
इस लिए बलिदान तो क्या जानता हूँ,
मैं इसे कर्त्तव्य-पालन मानता हूँ।
आज तुमसे माँगता क्या मान मेरा?
मृत्यु ही जब बन गई वरदान मेरा।
मैं मरूंगा ताकि बाकी लोग जीवें,
फिर न दानव मानवों का रक्त पीवें।
क्या पता है, मैं कहाँ को जा रहा हूँ,
किन्तु अन्तिम शाँति सचमुच पा रहा हूँ।
लोक के हित को रहा है प्राण-अर्पण,
आज मेरा हो गया है धन्य जीवन।
और को सुख दे रहा हूँ कष्ट सहकर,
हो गए ऋषि शान्त इतनी बात कहकर।

ब्राह्मण वह है,जो चाणक्य के रूप में,अपना अपमान होने पर धनानन्द को चुनौती देकर कहता है कि अब यह शिखा तभी बँधेगी जब तुम्हारा  नाश कर दूंगा और ऐसा करके ही शिखा बाँधता है।

ब्राह्मण वह है जो अर्थ शास्त्र की ऐसी पुस्तक देता है,जो आज तक अद्वितीय है।

ब्राह्मण वह है जो पुष्य मित्र शुंग के रूप में मौर्य वंश के अंतिम सम्राट बृहद्रथ को ,उठाता है तलवार और स्वाहा कर देता है।भारत को बौद्ध होने से बचा लेता है।यवन आक्रमण की ऐसी की तैसी कर देता है।

ब्राह्मण वह है जो मण्डन मिश्र के रूप में जन्म लिया और जिसके घर पर तोता भी संस्कृत में दर्शन पर वाद विवाद करते थे।अगर पता नहीं है तो यह श्लोक पढो, जो आदि शंकर के मण्डन मिश्र के घर का पता पूछने पर उनकी दासियों ने कहा था-
स्वतः प्रमाणं परतः प्रमाणं,
कीरांगना यत्र गिरा गिरंति।
द्वारस्थ नीण अंतर संनिरुद्धा,
जानीहि तंमण्डन पंडितौकः।
(जिस घर के दरवाजे पर पिंजरे में बन्द तोता भी वेद के स्वतः प्रमाण या परतः प्रमाण की चर्चा कर रहा हो,उसे ही मण्डन मिश्र का घर समझना।)

ब्राह्मण वह है जो शंकराचार्य के रूप में 32 वर्ष की उम्र तक वह सब कर जाता है,जिसकी कल्पना भी सम्भव नहीं है।अद्वैत वेदान्त,दर्शन का शिरोमणि।

ब्राह्मण वह है जो अस्त व्यस्त अनियंत्रित भाषा को व्याकरण बद्ध कर पाणिनि के रूप में अष्टाध्यायी लिख देता है।

ब्राह्मण वह है,जो पतंजलि के रूप में अश्वमेध यज्ञ कराता है और महाभाष्य लिख देता है।

ब्राह्मण वह है जो तुलसी के रूप में ऐसा महाकाव्य श्री राम चरित मानस, लिख देता है,जो जन जन की गीता बन जाती है।

और बताऊँ ब्राह्मण कौन है?

ब्राह्मण है वह नारायण,जिसने महाराणा प्रताप व उनके भाई शक्ति सिंह के मध्य युद्ध को रोकने के लिए,उनके समक्ष चाकू से अपनी ही हत्या कर दिया था।पता नहीं है तो श्याम नारायन पांडेय का महाकाव्य हल्दी घाटी,प्रथम सर्ग की ये पंक्तियां पढ़ो-

उठा लिया विकराल छुरा
सीने में मारा ब्राह्मण ने।
उन दोनों के बीच बहा दी
शोणित–धारा ब्राह्मण ने।।

वन का तन रँग दिया रूधिर से
दिखा दिया¸ है त्याग यही।
निज स्वामी के प्राणों की
रक्षा का है अनुराग यही॥

ब्राह्मण था वह ब्राह्मण था¸
हित राजवंश का सदा किया।
निज स्वामी का नमक हृदय का
रक्त बहाकर अदा किया॥

ब्राह्मण वह है जो श्याम नारायण पांडेय के रूप में जन्म लेकर,हल्दी घाटी,जौहर,जैसे हिंदी के महाकाव्य लिख डाले, जो अपनी दार्शनिकता व वीर रस के कारण अमर है।थोड़ा परिश्रम करो और जौहर के मंगलाचरण की प्रारंभिक पंक्तियाँ ही पढ़ लो,बुद्धि ठीक हो जाएगी-

गगन के उस पार क्या,
पाताल के इस पार क्या है?
क्या क्षितिज के पार? जग
जिस पर थमा आधार क्या है?

दीप तारों के जलाकर
कौन नित करता दिवाली?
चाँद - सूरज घूम किसकी
आरती करते निराली?

ब्राह्मण वह है जो सूर्य कांत त्रिपाठी के रूप में अवतरित हुआ और अपने साहित्य के निरालेपन,जीवन के अक्खड़पन से निराला बन गया।अमर है निराला की राम की शक्ति पूजा-

बोले विश्वस्त कण्ठ से जाम्बवान-"रघुवर,
विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण,
हे पुरुषसिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण,
आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर,
तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर।
रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सकता त्रस्त
तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त,
शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन।

धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध,
धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध
जानकी! हाय उद्धार प्रिया का हो न सका,
वह एक और मन रहा राम का जो न थका,
जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय,
कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय,

ब्राह्मण को समझना चाहते हो तो अटल विहारी वाजपेयी के धाराप्रवाह भाषण को सुनिए।भारत रग रग में भर जाएगा।यह भी न हो सके तो सिर्फ ये पंक्तियां पढ़ लीजिये जनाब-

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये।

आग्नेय परीक्षा की
इस घड़ी में—
आइए, अर्जुन की तरह
उद्घोष करें :
‘‘न दैन्यं न पलायनम्।’

ब्राह्मण ने तो भगवान को भी अश्रु बहाने को बाध्य कर दिया था।याद है गरीब ब्राह्मण सुदामा कृष्ण की मित्रता।
महाकवि नरोत्तम दास के शब्दों में-

ऐसे बेहाल बेवाइन सों पग, कंटक-जाल लगे पुनि जोये।
हाय! महादुख पायो सखा तुम, आये इतै न किते दिन खोये॥
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिके करुनानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सौं पग धोये।

ब्राह्मण प्रज्ञा चक्षु होता है,प्रज्ञाचक्षु।बिना आंख के असम्भव को संभव बना देता है।मूर्खों को यह समझ मे नहीं आएगा।जाकर वर्तमान में स्वामी राम भद्राचार्य अर्थात गिरिधर मिश्र जी को चित्र कूट में देखिए।02 माह के थे,जब आंख की रोशनी चली गयी।अब तक 100 से ज्यादा ग्रंथों के लेखक,22 भाषाओं के ज्ञाता,संस्कृत में दो महाकाव्य-श्री भार्गव राघवीयम और गीत रामायनम।
हिंदी में दो महाकाव्य-अष्टावक्र और अरुंधती।

प्रकृति के सुकुमार कवि,श्री सुमित्रा नन्दन पन्त जी को क्यों विस्मृत करें।कुछ तो है ब्राह्मण रक्त में जरूर।देखिए पन्त जी की उदार विश्व कल्याण की वाणी-
तप रे, मधुर मन!

विश्व-वेदना में तप प्रतिपल,
जग-जीवन की ज्वाला में गल,
बन अकलुष, उज्जवल औ\' कोमल
तप रे, विधुर-विधुर मन!

अपने सजल-स्वर्ण से पावन
रच जीवन की पूर्ति पूर्णतम
स्थापित कर जग अपनापन,
ढल रे, ढल आतुर मन!

तेरी मधुर मुक्ति ही बन्धन,
गंध-हीन तू गंध-युक्त बन,
निज अरूप में भर स्वरूप, मन
मूर्तिमान बन निर्धन!
गल रे, गल निष्ठुर मन।

ब्राह्मण कभी भी निम्न चिंतन करता ही नहीं है।वह हमेशा सत्य,न्याय,धर्म,सदाचार,देश प्रेम की बात करता है।राम नरेश त्रिपाठी जी की इस कविता से यह बात प्रमाणित हो जाती है-

हे प्रभु आनंद-दाता
हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिये,
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए,
लीजिये हमको शरण में, हम सदाचारी बनें,
ब्रह्मचारी धर्म-रक्षक वीर व्रत धारी बनें,
निंदा किसी की हम किसी से भूल कर भी न करें,
ईर्ष्या कभी भी हम किसी से भूल कर भी न करें,
सत्य बोलें, झूठ त्यागें, मेल आपस में करें,
दिव्या जीवन हो हमारा, यश तेरा गाया करें,
जाये हमारी आयु हे प्रभु लोक के उपकार में,
हाथ डालें हम कभी न भूल कर अपकार में,
कीजिए हम पर कृपा ऐसी हे परमात्मा,
मोह मद मत्सर रहित होवे हमारी आत्मा,
प्रेम से हम गुरु जनों की नित्य ही सेवा करें,
प्रेम से हम संस्कृति की नित्य ही सेवा करें,
योग विद्या ब्रह्म विद्या हो अधिक प्यारी हमें,
ब्रह्म निष्ठा प्राप्त कर के सर्व हितकारी बनें,
हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिये।

ब्राह्मण की तो इतनी लंबी श्रृंखला है कि ग्रन्थ लिखा जा सकता है।आशा,उत्साह,त्याग,गति,यही सब तो ब्राह्मण की पूंजी है।देखिए बाल कृष्ण शर्मा नवीन की यह रचना-

कौन कहता है की तुमको खा सकेगा काल ?
अरे? तुम हो काल के भी काल अति विकराल
काल का तब धनुष, दिक् की है धनुष की डोर;
धनु-विकंपन से सिहरती सृजन-नाश-हिलोर!
तुम प्रबल दिक्-काल-धनु-धारी सुधन्वा वीर;
तुम चलाते हो सदा चिर चेतना के तीर!

क्या बिगाड़ेगा तुम्हारा, यह क्षणिक आतंक?
क्या समझते हो की होगे नष्ट तुम अकलंक?
यह निपट आतंक भी है भीति-ओत-प्रोत!
और तुम? तुम हो चिरंतन अभयता के स्त्रोत!!
एक क्षण को भी न सोचो की तुम होगे नष्ट,
तुम अनश्वर हो! तुम्हारा भाग्य है सुस्पष्ट!

चिर विजय दासी तुम्हारी, तुम जयी उद्बुद्ध,
क्यों बनो हट आश तुम, लख मार्ग निज अवरुद्ध?
फूँक से तुमने उड़ाई भूधरों की पाँत;
और तुमने खींच फेंके काल के भी दाँत;
क्या करेगा यह बिचारा तनिक सा अवरोध?
जानता है जग तुम्हारा है भयंकर क्रोध!

जब करोगे क्रोध तुम, तब आएगा भूडोल,
काँप उठेंगे सभी भूगोल और खगोल,
नाश की लपटें उठेंगी गगन-मंडल बीच;
भस्म होंगी ये असामाजिक प्रथाएँ नीच!
औ पधारेगा सृजन कर अग्नि से सुस्नान;
मत बनो गत आश! तुम हो चिर अनंत महान!

राम विलास शर्मा का नाम तो सबने सुना ही है।ब्राह्मण कुल मणि शर्मा जी ने लगभग 100 पुस्तकें लिखा।निराला को प्रसिद्धि दिलाई।अब कोई मूर्ख इन्हें न पढ़े, तो
किसका दोष?इनकी एक ही रचना से इनके व्यक्तित्व का दर्शन हो जाता है-

राम विलास शर्मा की प्रसिद्ध रचना-कवि।

वह सहज विलम्बित मंथर गति जिसको निहार
गजराज लाज से राह छोड़ दे एक बार,
काले लहराते बाल देव-सा तन विशाल,
आर्यों का गर्वोन्नत प्रशस्त, अविनीत भाल,
झंकृत करती थी जिसकी वीणा में अमोल,
शारदा सरस वीणा के सार्थक सधे बोल,-
कुछ काम न आया वह कवित्व, आर्यत्व आज,
संध्या की वेला शिथिल हो गए सभी साज।
पथ में अब वन्य जन्तुओं का रोदन कराल।
एकाकीपन के साथी हैं केवल श्रृगाल।

अब कहाँ यक्ष से कवि-कुल-गुरु का ठाट-बाट ?
अर्पित है कवि चरणों में किसका राजपाट ?
उन स्वर्ण-खचित प्रासादों में किसका विलास ?
कवि के अन्त:पुर में किस श्यामा का निवास?
पैरों में कठिन बि‍वाई कटती नहीं डगर,
आँखों में आँसू, दुख से खुलते नहीं अधर !
खो गया कहीं सूने नभ में वह अरुण राग,
धूसर संध्या में कवि उदास है वीतराग !
अब वन्य-जन्तुओं का पथ में रोदन कराल ।
एकाकीपन के साथी हैं केवल श्रृगाल ।

अज्ञान-निशा का बीत चुका है अंधकार,
खिल उठा गगन में अरुण-ज्योति का सहस्नार ।
किरणों ने नभ में जीवन के लिख दिए लेख,
गाते हैं वन के विहग-ज्योति का गीत एक ।
फिर क्यों पथ में संध्या की छाया उदास ?
क्यों सहस्नार का मुरझाया नभ में प्रकाश ?
किरणों ने पहनाया था जिसको मुकुट एक,
माथे पर वहीं लिखे हैं दुख के अमिट लेख।
अब वन्य जन्तुओं का पथ में रोदन कराल ।
एकाकीपन के साथी हैं, केवल श्रृगाल।

इन वन्य-जन्तुओं से मनुष्य फिर भी महान्,
तू क्षुद्र-मरण से जीवन को ही श्रेष्ठ मान।
‘रावण-महिमा-श्यामा-विभावरी-अन्धकार’-
छँट गया तीक्ष्‍ण-बाणों से वह भी तम अपार।
अब बीती बहुत रही थोड़ी, मत हो निराश
छाया-सी संध्या का यद्यपि धूसर प्रकाश।
उस वज्र-हृदय से फिर भी तू साहस बटोर,
कर दिए विफल जिसने प्रहार विधि के कठोर।
क्या कर लेगा मानव का यह रोदन कराल ?
रोने दे यदि रोते हैं वन-पथ में श्रृगाल।

कट गई डगर जीवन की, थोड़ी रही और,
इन वन में कुश-कंटक, सोने को नहीं ठौर।
क्षत चरण न विचलित हों, मुँह से निकले न आह,
थक कर मत गिर पडऩा, ओ साथी बीच राह।
यह कहे न कोई-जीर्ण हो गया जब शरीर,
विचलित हो गया हृदय भी पीड़ा अधीर।
पथ में उन अमिट रक्त-चिह्नों की रहे शान,
मर मिटने को आते हैं पीछे नौजवान।
इन सब में जहाँ अशुभ ये रोते हैं श्रृगाल।
नि‍र्मित होगी जन-सत्ता की नगरी वि‍शाल।

एक और ब्राह्मण,श्री धर पाठक,क्या अनुभूति है,क्या ज्ञान है,क्या शब्द है।एक बात तो माननी ही होगी कि ब्राह्मण हमेशा उदात्त भाव प्रेमी ही होता है,इसी लिए आजकल लोग इससे जलते भी हैं।देखिए पाठक जी की रचना-

भारत हमारा कैसा सुंदर सुहा रहा है
शुचि भाल पै हिमाचल, चरणों पै सिंधु-अंचल
उर पर विशाल-सरिता-सित-हीर-हार-चंचल
मणि-बद्धनील-नभ का विस्तीर्ण-पट अचंचल
सारा सुदृश्य-वैभव मन को लुभा रहा है
भारत हमारा कैसा सुंदर सुहा रहा है

हे वंदनीय भारत, अभिनंदनीय भारत
हे न्याय-बंधु, निर्भय, निर्बंधनीय भारत
मम प्रेम-पाणि-पल्लव-अवलंबनीय भारत
मेरा ममत्व सारा तुझमें समा रहा है
भारत हमारा कैसा सुंदर सुहा रहा है

श्री धर पाठक,हिन्द महिमा

।जय, जयति–जयति प्राचीन हिंद।
जय नगर, ग्राम अभिराम हिंद ।
जय, जयति-जयति सुख-धाम हिंद ।
जय, सरसिज-मधुकर निकट हिंद
जय जयति हिमालय-शिखर-हिंद
जय जयति विंध्य-कन्दरा हिंद
जय मलयज-मेरु-मंदरा हिंद।
जय शैल-सुता सुरसरी हिंद
जय यमुना-गोदावरी हिंद
जय जयति सदा स्वाधीन हिंद
जय, जयति–जयति प्राचीन हिंद।

ब्राह्मण वह है जो गाय का मांस नहीं खाता है,बल्कि इसे मात्र मुंह से लगाने का आदेश देने पर,मंगल पांडेय के रूप में, तत्काल अपने अधिकारी को गोली मार देता है और 1857 की क्रांति का नायक बन जाता है।मरे हुओं में प्राण फूंक देता है।

ब्राह्मण वह है जो बंकिम चन्द्र चटर्जी के रूप में धरती पर आता है और गुलामी की जंजीरों से खिन्न होकर,वेद के पृथ्वी सूक्त का नया संस्करण,वन्दे मातरम के रूप में देकर क्रांति का नायक बन जाता है।देखिए आनन्द मठ के सन्यासी स्वामी भवानन्द का क्रांति गीत-

वंदे मातरम्‌ ।

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्‌
शस्यश्यामलां मातरम्‌ ।
वन्दे मातरम।

शुभ्रज्योत्‍स्‍नापुलकितयामिनीं,
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीं,
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीं,
सुखदां वरदां मातरम्‌ ॥
वंदे मातरम्‌ ।

कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले,
कोटि-कोटि-भुजैधृत-खरकरवाले,
अबला केन मा एत बले ।
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं
रिपुदलवारिणीं मातरम्‌ ॥
वंदे मातरम्‌ ।

तुमि विद्या, तुमि धर्म,
तुमि हृदि, तुमि मर्म,
त्वं हि प्राणाः शरीरे,
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारई प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे मातरम्‌ ॥
वंदे मातरम्‌ ।

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदलविहारिणी,
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्‌
कमलां अमलां अतुलां सुजलां सुफलां मातरम्‌ ॥
वंदे मातरम्‌ ।

श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषितां
धरणीं भरणीं मातरम्‌ ॥
वंदे मातरम्‌ ।

और बताऊँ ब्राह्मण क्या होता है?
ब्राह्मण होता है बाजीराव पेशवा,जो शिखा धारण करता है,चंदन लगाता है और विशाल मुस्लिम साम्राज्य को अपनी लपलपाती तलवार से काट डालता है।जीवन मे लगभग 41 युद्ध लड़ता है और कोई भी हारता नहीं है।
विषम परिस्थितियों में भी कहता है-

चीते की चाल, बाज की नजर और बाजीराव की तलवार पर संदेह नहीं करते.

अरे,मैं तो कुछ भूल ही गया था।ब्राह्मण होता है प्रचेता ऋषि का पुत्र महर्षि वाल्मीकि,जो क्रौंच पक्षी की हत्या से ऐसा विक्षुब्ध होता है कि संस्कृत का पहला महाकाव्य रामायण लिख देता है और ऐसी बुद्धि का प्रयोग करता है कि आज तक विद्वान इसी ग्रन्थ से रक्त,अस्थि,मज़्ज़ा प्राप्त करते हैं।

ब्राह्मण होता है बाल गंगाधर तिलक,जो उस समय निडर हो कर उद्घोष करता है-स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे,जब शेष लोग अंग्रेजों के समक्ष दंडवत कर रहे होते हैं।वेलेंटाइन शिरोल ने जिसे कहा था-फादर आफ इंडियन अनरेस्ट।

ब्राह्मण होती है झांसी की रानी लक्ष्मी बाई,जिसके सन 1857 की गाथा को याद कर सुभद्रा कुमारी चौहान को लिखना पड़ जाता है-
चमक उठी सन सत्तावन में,
वह तलवार पुरानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो,
झांसी वाली रानी थी।

अरे रुको,रुको,अभी जाना मत।अभी कुछ और लिखने वाला हूँ।ब्राह्मण क्या है,इसे वीर सावरकर के इस कथन में खोजो-

काल स्वयं मुझसे डरा है,
मैं काल से नहीं।
काले पानी का कालकूट पीकर,
काल से कराल स्तंभों को झकझोर कर,
मैं बार बार लौट आया हूँ,
और फिर भी मैं जीवित हूँ।
हारी मृत्यु है,मैं नहीं।

अब इस लेख को और नहीं बढ़ाना चाहता।इसका समापन अब मैं अपनी ही तीन रचनाओं से करता हूँ।क्यों न करूँ?आखिर में भी तो ब्राह्मण हूँ और मुझे ब्राह्मण होने पर गर्व है।

कुहासा क्या कर लेगा?

तुम चलो सूर्य की चाल,
कुहासा क्या कर लेगा?
पल पल यह पथ निर्मित होगा,
गगन लोक कुहरा विचरेगा,
सूरज के इस तप के आगे,
घना अँधेरा नहीं टिकेगा।
जैसे कल रण छोड़ गया था,
वैसे आज पराजित होगा।
हे मानव!बस तन्मय होकर,
करते रहो प्रहार,
कुहासा क्या कर लेगा?
तुम चलो सूर्य की चाल,
कुहासा क्या कर लेगा?

उसमे कण कण तिमिर भरा है,
दरवाजे तम का पहरा है,
दीपों की लड़ियाँ बिखरी हैं,
बर्फीली रातें गहरी हैं,
सभी दीप मिल महाज्वाल बन,
करो अँधेरा पार,
कुहासा क्या कर लेगा?
तुम चलो सूर्य की चाल,
कुहासा क्या कर लेगा?

लहरें आती हैं आने दे,
सागर आज मचल जाने दे,
आसमान यह साक्षी होगा,
सच में तू इतिहास रचेगा,
श्वासों की गति रोक रोक कर,
साहिल-नाव,संभाल,
कुहासा क्या कर लेगा?
तुम चलो सूर्य की चाल,
कुहासा क्या कर लेगा?

राज नाथ तिवारी।

उस देश का यारों क्या होगा?

जिस देश में नाटक होते हों,
पाखंडी झूठे रोते हों,
छल,छद्म,का स्वागत होता हो,
स्वार्थी ही काँटा बोता हो,
अधिकारों का पागलपन हो,
कर्तव्य-शून्य-अपनापन हो,
अंतर्मन में हो घनी रात,
बाहर दर्शित वंचक प्रकाश,
सब नाम राम का लेते हों,
रावण की मदिरा पीते हों,
वाणी से शुभ वाचाली हों,
कर्मों से कुटिल कुचाली हों,
उस देश का यारों क्या होगा?

जिस देश में गीता लज्जित हो,
दासों का कैपिटल सज्जित हो,
बस दलित ही मूल निवासी हों,
सावर्णिक हुए प्रवासी हों,
मति मन्द सुशोभित होते हों,
मति मान कुपोषित होते हों,
ग्रंथों का मर्दन होता हो,
धर्मों का क्रंदन होता हो,
निज सैन्य बनाये जाते हों,
घर आग लगाए जाते हों,
आसुरी शक्ति की माया हो,
न हृदय में कोई दाया हो,
उस देश का यारों क्या होगा?

जिस देश में ब्राह्मण सहमा हो,
नतमस्तक उसकी गरिमा हो,
नामों,गोत्रों,में,टूटा हो,
बस बात बात में रूठा हो,
अज्ञानी और विलासी हो,
कर्मों से सत्यानाशी हो,
वैदिक धर्मों को भूला हो,
स्वार्थों में आग बबूला हो,
न पढ़ता हो,न लिखता हो,
ज्ञानी अपने को कहता हो,
उच्चादर्शों में जीता हो,
प्याला में मदिरा पीता हो,
उस देश का यारों क्या होगा?

जिस देश में राम विवादित हों,
अपने घर से निष्कासित हों,
कोई भी नर आ जाता हो,
यह देश गुलाम बनाता हो,
मंदिर को तोड़ा जाता हो,
निज धर्म को छोड़ा जाता हो,
हमलावर महिमामण्डित हों,
मिट्टी के वीर विखंडित हों,
इतिहास कलंकित होता हो,
अन्याय प्रसंसित होता हो,
भारत को मूरख कहते हों,
योरप,विद्वान समझते हैं,
उस देश का यारों क्या होगा?

पंडित राज नाथ तिवारी।

पश्य!पश्य!नटराजःनृत्यति।

संस्कृत वाङ्मय विमला सरिता,
प्रवहति भारत देशे।
बहु अवरोधम,विपुल विरोधम,
जीवति यद्यपि क्लेशे।

मार्गे पापी रिपु संतापी,
अधुना इयं अभंगा।
पावन गंगा यमुना धारा,
शीतल तरल तरंगा।

अस्मिन कवि भवभूति कारुणिक,
पूंजीभूतं नीरं।
रामः सीता यादे विलपति,
दहति समस्त शरीरं।

वाणभट्ट कल्लोल प्रचंडा,
वाणी धावति वेगा।
अचल भूमि जन मंगलकारी,
शौम्या दिव्या गंगा।

रिक यजु साम अथर्व समाहित,
परम पवित्रे नीरे।
ऋषि गण मंगल गीतं गायन,
संस्कृत तटिनी तीरे।

आरण्यक उपनिषद मनोहर,
हृदय हारिणी शोभा।
दृष्ट्वा मधुरा हरीतिमा खलु,
कस्य हृदय न लोभा।

भीष्म युधिष्ठिर विदुर प्रभृतयः,
निवसति विमल विचारे।
पांचजन्यधारी स्वर सलिला,
कुत्रास्मिन संसारे?

मर्यादा पुरुषोत्तम जीवन,
रामायण उपजिव्या।
वर्षति नीरद जलकण झम झम,
भवति वारिणी नव्या।

पश्य!पश्य!,नटराजः नृत्यति,
नव पंचा उद्घोषति।
पाणिनि ऋषि एकाग्री भूत्वा,
अष्टाध्यायी पोषति।

मूर्ख अतीते अति भयभीते,
इह काले अपि पाहन।
उत्तिष्ठत!जाग्रत!हे भू सुर!
कुरु संस्कृतावगाहन।
पंडित राज नाथ तिवारी।

पंडित राज नाथ तिवारी।
30/05/17 कौन है।

ब्राह्मण वह है जो वशिष्ठ के रूप में केवल अपना एक दंड जमीन में गाड़ देता है,जिससे विश्वामित्र के समस्त अस्त्र शस्त्र चूर हो जाते हैं और विश्वामित्र लज्जित होकर कह पड़ते हैं-
धिक बलं क्षत्रिय बलं,ब्रह्म तेजो बलं बलं।
एकेन ब्रह्म दण्डेन,सर्वस्त्राणि हतानि में।
(क्षत्रिय के बल को धिक्कार है।ब्राह्मण का तेज ही असली बल है।ब्राह्मण वशिष्ठ का एक ब्रह्म दंड मेरे समस्त अस्त्र शस्त्र को निर्वीर्य कर दिया)

ब्राह्मण वह है जो परशुराम के रूप में एक बार नहीं,21 बार आततायी राजाओं का संहार करता है।जिसके लिए भगवान राम भी कहते हैं-

विप्र वंश करि यह प्रभुताई।
अभय होहुँ जो तुम्हहिं डेराई।
जिनके विषय मे यह श्लोक प्रसिद्ध है-

अग्रतः चतुरो वेदाः पृष्ठतः सशरं धनुः ।
इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ।।

चार वेद मौखिक हैं अर्थात् पूर्ण ज्ञान है एवं पीठपर धनुष-बाण है, अर्थात् शौर्य है,अर्थात् यहां ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेज, दोनों हैं । जो कोई इनका विरोध करेगा, उसे शाप देकर अथवा बाणसे परशुराम पराजित करेंगे । ऐसी उनकी विशेषता है ।

ब्राह्मण वह है,जो दधीचि के रूप में अपनी हड्डियों से बज्र बनवाकर,वृत्तासुर का अंत कराता है।जब तक धरती है,इतिहास मिट नहीं सकता-

ठीक है, ये प्राण क्षण-भंगुर हमारे,
किन्तु फिर भी हैं सभी को प्राण प्यारे।
मृत्यु का भय तो सभी को दाहता है,
तुम बताओ कौन मरना चाहता है?
किन्तु घबराओ नहीं, मैं प्राण दूँगा,
मृत्यु-भय से तर्क का आश्रय न लूँगा।
स्वार्थ है इसमें तुम्हारा जानता हूँ,
किन्तु यह परमार्थ भी है, मानता हूँ।
यों तुम्हें लज्जित किया, मत मान लेना,
भाव हैं सच्चे हृदय के जान लेना।
सोचता हूँ जन्म का उद्देश्य क्या है?
किस लिए पैदा हुआ हूँ क्या किया है?
बहुत वर्षों साधना की, ज्ञान पाया,
किन्तु लगता व्यर्थ ही जीवन गँवाया।
आज अपने पास देखी मृत्यु छाया,
और सच्चे ज्ञान का आभास पाया।
विश्व, वैभव, मान-यश ले क्या करूंगा?
सब मिलेगा किन्तु फिर भी तो मरूंगा।
इस लिए बलिदान तो क्या जानता हूँ,
मैं इसे कर्त्तव्य-पालन मानता हूँ।
आज तुमसे माँगता क्या मान मेरा?
मृत्यु ही जब बन गई वरदान मेरा।
मैं मरूंगा ताकि बाकी लोग जीवें,
फिर न दानव मानवों का रक्त पीवें।
क्या पता है, मैं कहाँ को जा रहा हूँ,
किन्तु अन्तिम शाँति सचमुच पा रहा हूँ।
लोक के हित को रहा है प्राण-अर्पण,
आज मेरा हो गया है धन्य जीवन।
और को सुख दे रहा हूँ कष्ट सहकर,
हो गए ऋषि शान्त इतनी बात कहकर।

ब्राह्मण वह है,जो चाणक्य के रूप में,अपना अपमान होने पर धनानन्द को चुनौती देकर कहता है कि अब यह शिखा तभी बँधेगी जब तुम्हारा  नाश कर दूंगा और ऐसा करके ही शिखा बाँधता है।

ब्राह्मण वह है जो अर्थ शास्त्र की ऐसी पुस्तक देता है,जो आज तक अद्वितीय है।

ब्राह्मण वह है जो पुष्य मित्र शुंग के रूप में मौर्य वंश के अंतिम सम्राट बृहद्रथ को ,उठाता है तलवार और स्वाहा कर देता है।भारत को बौद्ध होने से बचा लेता है।यवन आक्रमण की ऐसी की तैसी कर देता है।

ब्राह्मण वह है जो मण्डन मिश्र के रूप में जन्म लिया और जिसके घर पर तोता भी संस्कृत में दर्शन पर वाद विवाद करते थे।अगर पता नहीं है तो यह श्लोक पढो, जो आदि शंकर के मण्डन मिश्र के घर का पता पूछने पर उनकी दासियों ने कहा था-
स्वतः प्रमाणं परतः प्रमाणं,
कीरांगना यत्र गिरा गिरंति।
द्वारस्थ नीण अंतर संनिरुद्धा,
जानीहि तंमण्डन पंडितौकः।
(जिस घर के दरवाजे पर पिंजरे में बन्द तोता भी वेद के स्वतः प्रमाण या परतः प्रमाण की चर्चा कर रहा हो,उसे ही मण्डन मिश्र का घर समझना।)

ब्राह्मण वह है जो शंकराचार्य के रूप में 32 वर्ष की उम्र तक वह सब कर जाता है,जिसकी कल्पना भी सम्भव नहीं है।अद्वैत वेदान्त,दर्शन का शिरोमणि।

ब्राह्मण वह है जो अस्त व्यस्त अनियंत्रित भाषा को व्याकरण बद्ध कर पाणिनि के रूप में अष्टाध्यायी लिख देता है।

ब्राह्मण वह है,जो पतंजलि के रूप में अश्वमेध यज्ञ कराता है और महाभाष्य लिख देता है।

ब्राह्मण वह है जो तुलसी के रूप में ऐसा महाकाव्य श्री राम चरित मानस, लिख देता है,जो जन जन की गीता बन जाती है।

और बताऊँ ब्राह्मण कौन है?

ब्राह्मण है वह नारायण,जिसने महाराणा प्रताप व उनके भाई शक्ति सिंह के मध्य युद्ध को रोकने के लिए,उनके समक्ष चाकू से अपनी ही हत्या कर दिया था।पता नहीं है तो श्याम नारायन पांडेय का महाकाव्य हल्दी घाटी,प्रथम सर्ग की ये पंक्तियां पढ़ो-

उठा लिया विकराल छुरा
सीने में मारा ब्राह्मण ने।
उन दोनों के बीच बहा दी
शोणित–धारा ब्राह्मण ने।।

वन का तन रँग दिया रूधिर से
दिखा दिया¸ है त्याग यही।
निज स्वामी के प्राणों की
रक्षा का है अनुराग यही॥

ब्राह्मण था वह ब्राह्मण था¸
हित राजवंश का सदा किया।
निज स्वामी का नमक हृदय का
रक्त बहाकर अदा किया॥

ब्राह्मण वह है जो श्याम नारायण पांडेय के रूप में जन्म लेकर,हल्दी घाटी,जौहर,जैसे हिंदी के महाकाव्य लिख डाले, जो अपनी दार्शनिकता व वीर रस के कारण अमर है।थोड़ा परिश्रम करो और जौहर के मंगलाचरण की प्रारंभिक पंक्तियाँ ही पढ़ लो,बुद्धि ठीक हो जाएगी-

गगन के उस पार क्या,
पाताल के इस पार क्या है?
क्या क्षितिज के पार? जग
जिस पर थमा आधार क्या है?

दीप तारों के जलाकर
कौन नित करता दिवाली?
चाँद - सूरज घूम किसकी
आरती करते निराली?

ब्राह्मण वह है जो सूर्य कांत त्रिपाठी के रूप में अवतरित हुआ और अपने साहित्य के निरालेपन,जीवन के अक्खड़पन से निराला बन गया।अमर है निराला की राम की शक्ति पूजा-

बोले विश्वस्त कण्ठ से जाम्बवान-"रघुवर,
विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण,
हे पुरुषसिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण,
आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर,
तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर।
रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सकता त्रस्त
तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त,
शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन।

धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध,
धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध
जानकी! हाय उद्धार प्रिया का हो न सका,
वह एक और मन रहा राम का जो न थका,
जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय,
कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय,

ब्राह्मण को समझना चाहते हो तो अटल विहारी वाजपेयी के धाराप्रवाह भाषण को सुनिए।भारत रग रग में भर जाएगा।यह भी न हो सके तो सिर्फ ये पंक्तियां पढ़ लीजिये जनाब-

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये।

आग्नेय परीक्षा की
इस घड़ी में—
आइए, अर्जुन की तरह
उद्घोष करें :
‘‘न दैन्यं न पलायनम्।’

ब्राह्मण ने तो भगवान को भी अश्रु बहाने को बाध्य कर दिया था।याद है गरीब ब्राह्मण सुदामा कृष्ण की मित्रता।
महाकवि नरोत्तम दास के शब्दों में-

ऐसे बेहाल बेवाइन सों पग, कंटक-जाल लगे पुनि जोये।
हाय! महादुख पायो सखा तुम, आये इतै न किते दिन खोये॥
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिके करुनानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सौं पग धोये।

ब्राह्मण प्रज्ञा चक्षु होता है,प्रज्ञाचक्षु।बिना आंख के असम्भव को संभव बना देता है।मूर्खों को यह समझ मे नहीं आएगा।जाकर वर्तमान में स्वामी राम भद्राचार्य अर्थात गिरिधर मिश्र जी को चित्र कूट में देखिए।02 माह के थे,जब आंख की रोशनी चली गयी।अब तक 100 से ज्यादा ग्रंथों के लेखक,22 भाषाओं के ज्ञाता,संस्कृत में दो महाकाव्य-श्री भार्गव राघवीयम और गीत रामायनम।
हिंदी में दो महाकाव्य-अष्टावक्र और अरुंधती।

प्रकृति के सुकुमार कवि,श्री सुमित्रा नन्दन पन्त जी को क्यों विस्मृत करें।कुछ तो है ब्राह्मण रक्त में जरूर।देखिए पन्त जी की उदार विश्व कल्याण की वाणी-
तप रे, मधुर मन!

विश्व-वेदना में तप प्रतिपल,
जग-जीवन की ज्वाला में गल,
बन अकलुष, उज्जवल औ\' कोमल
तप रे, विधुर-विधुर मन!

अपने सजल-स्वर्ण से पावन
रच जीवन की पूर्ति पूर्णतम
स्थापित कर जग अपनापन,
ढल रे, ढल आतुर मन!

तेरी मधुर मुक्ति ही बन्धन,
गंध-हीन तू गंध-युक्त बन,
निज अरूप में भर स्वरूप, मन
मूर्तिमान बन निर्धन!
गल रे, गल निष्ठुर मन।

ब्राह्मण कभी भी निम्न चिंतन करता ही नहीं है।वह हमेशा सत्य,न्याय,धर्म,सदाचार,देश प्रेम की बात करता है।राम नरेश त्रिपाठी जी की इस कविता से यह बात प्रमाणित हो जाती है-

हे प्रभु आनंद-दाता
हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिये,
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए,
लीजिये हमको शरण में, हम सदाचारी बनें,
ब्रह्मचारी धर्म-रक्षक वीर व्रत धारी बनें,
निंदा किसी की हम किसी से भूल कर भी न करें,
ईर्ष्या कभी भी हम किसी से भूल कर भी न करें,
सत्य बोलें, झूठ त्यागें, मेल आपस में करें,
दिव्या जीवन हो हमारा, यश तेरा गाया करें,
जाये हमारी आयु हे प्रभु लोक के उपकार में,
हाथ डालें हम कभी न भूल कर अपकार में,
कीजिए हम पर कृपा ऐसी हे परमात्मा,
मोह मद मत्सर रहित होवे हमारी आत्मा,
प्रेम से हम गुरु जनों की नित्य ही सेवा करें,
प्रेम से हम संस्कृति की नित्य ही सेवा करें,
योग विद्या ब्रह्म विद्या हो अधिक प्यारी हमें,
ब्रह्म निष्ठा प्राप्त कर के सर्व हितकारी बनें,
हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिये।

ब्राह्मण की तो इतनी लंबी श्रृंखला है कि ग्रन्थ लिखा जा सकता है।आशा,उत्साह,त्याग,गति,यही सब तो ब्राह्मण की पूंजी है।देखिए बाल कृष्ण शर्मा नवीन की यह रचना-

कौन कहता है की तुमको खा सकेगा काल ?
अरे? तुम हो काल के भी काल अति विकराल
काल का तब धनुष, दिक् की है धनुष की डोर;
धनु-विकंपन से सिहरती सृजन-नाश-हिलोर!
तुम प्रबल दिक्-काल-धनु-धारी सुधन्वा वीर;
तुम चलाते हो सदा चिर चेतना के तीर!

क्या बिगाड़ेगा तुम्हारा, यह क्षणिक आतंक?
क्या समझते हो की होगे नष्ट तुम अकलंक?
यह निपट आतंक भी है भीति-ओत-प्रोत!
और तुम? तुम हो चिरंतन अभयता के स्त्रोत!!
एक क्षण को भी न सोचो की तुम होगे नष्ट,
तुम अनश्वर हो! तुम्हारा भाग्य है सुस्पष्ट!

चिर विजय दासी तुम्हारी, तुम जयी उद्बुद्ध,
क्यों बनो हट आश तुम, लख मार्ग निज अवरुद्ध?
फूँक से तुमने उड़ाई भूधरों की पाँत;
और तुमने खींच फेंके काल के भी दाँत;
क्या करेगा यह बिचारा तनिक सा अवरोध?
जानता है जग तुम्हारा है भयंकर क्रोध!

जब करोगे क्रोध तुम, तब आएगा भूडोल,
काँप उठेंगे सभी भूगोल और खगोल,
नाश की लपटें उठेंगी गगन-मंडल बीच;
भस्म होंगी ये असामाजिक प्रथाएँ नीच!
औ पधारेगा सृजन कर अग्नि से सुस्नान;
मत बनो गत आश! तुम हो चिर अनंत महान!

राम विलास शर्मा का नाम तो सबने सुना ही है।ब्राह्मण कुल मणि शर्मा जी ने लगभग 100 पुस्तकें लिखा।निराला को प्रसिद्धि दिलाई।अब कोई मूर्ख इन्हें न पढ़े, तो
किसका दोष?इनकी एक ही रचना से इनके व्यक्तित्व का दर्शन हो जाता है-

राम विलास शर्मा की प्रसिद्ध रचना-कवि।

वह सहज विलम्बित मंथर गति जिसको निहार
गजराज लाज से राह छोड़ दे एक बार,
काले लहराते बाल देव-सा तन विशाल,
आर्यों का गर्वोन्नत प्रशस्त, अविनीत भाल,
झंकृत करती थी जिसकी वीणा में अमोल,
शारदा सरस वीणा के सार्थक सधे बोल,-
कुछ काम न आया वह कवित्व, आर्यत्व आज,
संध्या की वेला शिथिल हो गए सभी साज।
पथ में अब वन्य जन्तुओं का रोदन कराल।
एकाकीपन के साथी हैं केवल श्रृगाल।

अब कहाँ यक्ष से कवि-कुल-गुरु का ठाट-बाट ?
अर्पित है कवि चरणों में किसका राजपाट ?
उन स्वर्ण-खचित प्रासादों में किसका विलास ?
कवि के अन्त:पुर में किस श्यामा का निवास?
पैरों में कठिन बि‍वाई कटती नहीं डगर,
आँखों में आँसू, दुख से खुलते नहीं अधर !
खो गया कहीं सूने नभ में वह अरुण राग,
धूसर संध्या में कवि उदास है वीतराग !
अब वन्य-जन्तुओं का पथ में रोदन कराल ।
एकाकीपन के साथी हैं केवल श्रृगाल ।

अज्ञान-निशा का बीत चुका है अंधकार,
खिल उठा गगन में अरुण-ज्योति का सहस्नार ।
किरणों ने नभ में जीवन के लिख दिए लेख,
गाते हैं वन के विहग-ज्योति का गीत एक ।
फिर क्यों पथ में संध्या की छाया उदास ?
क्यों सहस्नार का मुरझाया नभ में प्रकाश ?
किरणों ने पहनाया था जिसको मुकुट एक,
माथे पर वहीं लिखे हैं दुख के अमिट लेख।
अब वन्य जन्तुओं का पथ में रोदन कराल ।
एकाकीपन के साथी हैं, केवल श्रृगाल।

इन वन्य-जन्तुओं से मनुष्य फिर भी महान्,
तू क्षुद्र-मरण से जीवन को ही श्रेष्ठ मान।
‘रावण-महिमा-श्यामा-विभावरी-अन्धकार’-
छँट गया तीक्ष्‍ण-बाणों से वह भी तम अपार।
अब बीती बहुत रही थोड़ी, मत हो निराश
छाया-सी संध्या का यद्यपि धूसर प्रकाश।
उस वज्र-हृदय से फिर भी तू साहस बटोर,
कर दिए विफल जिसने प्रहार विधि के कठोर।
क्या कर लेगा मानव का यह रोदन कराल ?
रोने दे यदि रोते हैं वन-पथ में श्रृगाल।

कट गई डगर जीवन की, थोड़ी रही और,
इन वन में कुश-कंटक, सोने को नहीं ठौर।
क्षत चरण न विचलित हों, मुँह से निकले न आह,
थक कर मत गिर पडऩा, ओ साथी बीच राह।
यह कहे न कोई-जीर्ण हो गया जब शरीर,
विचलित हो गया हृदय भी पीड़ा अधीर।
पथ में उन अमिट रक्त-चिह्नों की रहे शान,
मर मिटने को आते हैं पीछे नौजवान।
इन सब में जहाँ अशुभ ये रोते हैं श्रृगाल।
नि‍र्मित होगी जन-सत्ता की नगरी वि‍शाल।

एक और ब्राह्मण,श्री धर पाठक,क्या अनुभूति है,क्या ज्ञान है,क्या शब्द है।एक बात तो माननी ही होगी कि ब्राह्मण हमेशा उदात्त भाव प्रेमी ही होता है,इसी लिए आजकल लोग इससे जलते भी हैं।देखिए पाठक जी की रचना-

भारत हमारा कैसा सुंदर सुहा रहा है
शुचि भाल पै हिमाचल, चरणों पै सिंधु-अंचल
उर पर विशाल-सरिता-सित-हीर-हार-चंचल
मणि-बद्धनील-नभ का विस्तीर्ण-पट अचंचल
सारा सुदृश्य-वैभव मन को लुभा रहा है
भारत हमारा कैसा सुंदर सुहा रहा है

हे वंदनीय भारत, अभिनंदनीय भारत
हे न्याय-बंधु, निर्भय, निर्बंधनीय भारत
मम प्रेम-पाणि-पल्लव-अवलंबनीय भारत
मेरा ममत्व सारा तुझमें समा रहा है
भारत हमारा कैसा सुंदर सुहा रहा है

श्री धर पाठक,हिन्द महिमा

।जय, जयति–जयति प्राचीन हिंद।
जय नगर, ग्राम अभिराम हिंद ।
जय, जयति-जयति सुख-धाम हिंद ।
जय, सरसिज-मधुकर निकट हिंद
जय जयति हिमालय-शिखर-हिंद
जय जयति विंध्य-कन्दरा हिंद
जय मलयज-मेरु-मंदरा हिंद।
जय शैल-सुता सुरसरी हिंद
जय यमुना-गोदावरी हिंद
जय जयति सदा स्वाधीन हिंद
जय, जयति–जयति प्राचीन हिंद।

ब्राह्मण वह है जो गाय का मांस नहीं खाता है,बल्कि इसे मात्र मुंह से लगाने का आदेश देने पर,मंगल पांडेय के रूप में, तत्काल अपने अधिकारी को गोली मार देता है और 1857 की क्रांति का नायक बन जाता है।मरे हुओं में प्राण फूंक देता है।

ब्राह्मण वह है जो बंकिम चन्द्र चटर्जी के रूप में धरती पर आता है और गुलामी की जंजीरों से खिन्न होकर,वेद के पृथ्वी सूक्त का नया संस्करण,वन्दे मातरम के रूप में देकर क्रांति का नायक बन जाता है।देखिए आनन्द मठ के सन्यासी स्वामी भवानन्द का क्रांति गीत-

वंदे मातरम्‌ ।

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्‌
शस्यश्यामलां मातरम्‌ ।
वन्दे मातरम।

शुभ्रज्योत्‍स्‍नापुलकितयामिनीं,
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीं,
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीं,
सुखदां वरदां मातरम्‌ ॥
वंदे मातरम्‌ ।

कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले,
कोटि-कोटि-भुजैधृत-खरकरवाले,
अबला केन मा एत बले ।
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं
रिपुदलवारिणीं मातरम्‌ ॥
वंदे मातरम्‌ ।

तुमि विद्या, तुमि धर्म,
तुमि हृदि, तुमि मर्म,
त्वं हि प्राणाः शरीरे,
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारई प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे मातरम्‌ ॥
वंदे मातरम्‌ ।

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदलविहारिणी,
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्‌
कमलां अमलां अतुलां सुजलां सुफलां मातरम्‌ ॥
वंदे मातरम्‌ ।

श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषितां
धरणीं भरणीं मातरम्‌ ॥
वंदे मातरम्‌ ।

और बताऊँ ब्राह्मण क्या होता है?
ब्राह्मण होता है बाजीराव पेशवा,जो शिखा धारण करता है,चंदन लगाता है और विशाल मुस्लिम साम्राज्य को अपनी लपलपाती तलवार से काट डालता है।जीवन मे लगभग 41 युद्ध लड़ता है और कोई भी हारता नहीं है।
विषम परिस्थितियों में भी कहता है-

चीते की चाल, बाज की नजर और बाजीराव की तलवार पर संदेह नहीं करते.

अरे,मैं तो कुछ भूल ही गया था।ब्राह्मण होता है प्रचेता ऋषि का पुत्र महर्षि वाल्मीकि,जो क्रौंच पक्षी की हत्या से ऐसा विक्षुब्ध होता है कि संस्कृत का पहला महाकाव्य रामायण लिख देता है और ऐसी बुद्धि का प्रयोग करता है कि आज तक विद्वान इसी ग्रन्थ से रक्त,अस्थि,मज़्ज़ा प्राप्त करते हैं।

ब्राह्मण होता है बाल गंगाधर तिलक,जो उस समय निडर हो कर उद्घोष करता है-स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे,जब शेष लोग अंग्रेजों के समक्ष दंडवत कर रहे होते हैं।वेलेंटाइन शिरोल ने जिसे कहा था-फादर आफ इंडियन अनरेस्ट।

ब्राह्मण होती है झांसी की रानी लक्ष्मी बाई,जिसके सन 1857 की गाथा को याद कर सुभद्रा कुमारी चौहान को लिखना पड़ जाता है-
चमक उठी सन सत्तावन में,
वह तलवार पुरानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो,
झांसी वाली रानी थी।

अरे रुको,रुको,अभी जाना मत।अभी कुछ और लिखने वाला हूँ।ब्राह्मण क्या है,इसे वीर सावरकर के इस कथन में खोजो-

काल स्वयं मुझसे डरा है,
मैं काल से नहीं।
काले पानी का कालकूट पीकर,
काल से कराल स्तंभों को झकझोर कर,
मैं बार बार लौट आया हूँ,
और फिर भी मैं जीवित हूँ।
हारी मृत्यु है,मैं नहीं।

अब इस लेख को और नहीं बढ़ाना चाहता।इसका समापन अब मैं अपनी ही तीन रचनाओं से करता हूँ।क्यों न करूँ?आखिर में भी तो ब्राह्मण हूँ और मुझे ब्राह्मण होने पर गर्व है।

कुहासा क्या कर लेगा?

तुम चलो सूर्य की चाल,
कुहासा क्या कर लेगा?
पल पल यह पथ निर्मित होगा,
गगन लोक कुहरा विचरेगा,
सूरज के इस तप के आगे,
घना अँधेरा नहीं टिकेगा।
जैसे कल रण छोड़ गया था,
वैसे आज पराजित होगा।
हे मानव!बस तन्मय होकर,
करते रहो प्रहार,
कुहासा क्या कर लेगा?
तुम चलो सूर्य की चाल,
कुहासा क्या कर लेगा?

उसमे कण कण तिमिर भरा है,
दरवाजे तम का पहरा है,
दीपों की लड़ियाँ बिखरी हैं,
बर्फीली रातें गहरी हैं,
सभी दीप मिल महाज्वाल बन,
करो अँधेरा पार,
कुहासा क्या कर लेगा?
तुम चलो सूर्य की चाल,
कुहासा क्या कर लेगा?

लहरें आती हैं आने दे,
सागर आज मचल जाने दे,
आसमान यह साक्षी होगा,
सच में तू इतिहास रचेगा,
श्वासों की गति रोक रोक कर,
साहिल-नाव,संभाल,
कुहासा क्या कर लेगा?
तुम चलो सूर्य की चाल,
कुहासा क्या कर लेगा?

राज नाथ तिवारी।

उस देश का यारों क्या होगा?

जिस देश में नाटक होते हों,
पाखंडी झूठे रोते हों,
छल,छद्म,का स्वागत होता हो,
स्वार्थी ही काँटा बोता हो,
अधिकारों का पागलपन हो,
कर्तव्य-शून्य-अपनापन हो,
अंतर्मन में हो घनी रात,
बाहर दर्शित वंचक प्रकाश,
सब नाम राम का लेते हों,
रावण की मदिरा पीते हों,
वाणी से शुभ वाचाली हों,
कर्मों से कुटिल कुचाली हों,
उस देश का यारों क्या होगा?

जिस देश में गीता लज्जित हो,
दासों का कैपिटल सज्जित हो,
बस दलित ही मूल निवासी हों,
सावर्णिक हुए प्रवासी हों,
मति मन्द सुशोभित होते हों,
मति मान कुपोषित होते हों,
ग्रंथों का मर्दन होता हो,
धर्मों का क्रंदन होता हो,
निज सैन्य बनाये जाते हों,
घर आग लगाए जाते हों,
आसुरी शक्ति की माया हो,
न हृदय में कोई दाया हो,
उस देश का यारों क्या होगा?

जिस देश में ब्राह्मण सहमा हो,
नतमस्तक उसकी गरिमा हो,
नामों,गोत्रों,में,टूटा हो,
बस बात बात में रूठा हो,
अज्ञानी और विलासी हो,
कर्मों से सत्यानाशी हो,
वैदिक धर्मों को भूला हो,
स्वार्थों में आग बबूला हो,
न पढ़ता हो,न लिखता हो,
ज्ञानी अपने को कहता हो,
उच्चादर्शों में जीता हो,
प्याला में मदिरा पीता हो,
उस देश का यारों क्या होगा?

जिस देश में राम विवादित हों,
अपने घर से निष्कासित हों,
कोई भी नर आ जाता हो,
यह देश गुलाम बनाता हो,
मंदिर को तोड़ा जाता हो,
निज धर्म को छोड़ा जाता हो,
हमलावर महिमामण्डित हों,
मिट्टी के वीर विखंडित हों,
इतिहास कलंकित होता हो,
अन्याय प्रसंसित होता हो,
भारत को मूरख कहते हों,
योरप,विद्वान समझते हैं,
उस देश का यारों क्या होगा?

पंडित राज नाथ तिवारी।

पश्य!पश्य!नटराजःनृत्यति।

संस्कृत वाङ्मय विमला सरिता,
प्रवहति भारत देशे।
बहु अवरोधम,विपुल विरोधम,
जीवति यद्यपि क्लेशे।

मार्गे पापी रिपु संतापी,
अधुना इयं अभंगा।
पावन गंगा यमुना धारा,
शीतल तरल तरंगा।

अस्मिन कवि भवभूति कारुणिक,
पूंजीभूतं नीरं।
रामः सीता यादे विलपति,
दहति समस्त शरीरं।

वाणभट्ट कल्लोल प्रचंडा,
वाणी धावति वेगा।
अचल भूमि जन मंगलकारी,
शौम्या दिव्या गंगा।

रिक यजु साम अथर्व समाहित,
परम पवित्रे नीरे।
ऋषि गण मंगल गीतं गायन,
संस्कृत तटिनी तीरे।

आरण्यक उपनिषद मनोहर,
हृदय हारिणी शोभा।
दृष्ट्वा मधुरा हरीतिमा खलु,
कस्य हृदय न लोभा।

भीष्म युधिष्ठिर विदुर प्रभृतयः,
निवसति विमल विचारे।
पांचजन्यधारी स्वर सलिला,
कुत्रास्मिन संसारे?

मर्यादा पुरुषोत्तम जीवन,
रामायण उपजिव्या।
वर्षति नीरद जलकण झम झम,
भवति वारिणी नव्या।

पश्य!पश्य!,नटराजः नृत्यति,
नव पंचा उद्घोषति।
पाणिनि ऋषि एकाग्री भूत्वा,
अष्टाध्यायी पोषति।

मूर्ख अतीते अति भयभीते,
इह काले अपि पाहन।
उत्तिष्ठत!जाग्रत!हे भू सुर!
कुरु संस्कृतावगाहन।
पंडित राज नाथ तिवारी।

साभार:- पंडित राज नाथ तिवारी

बुधवार, 27 सितंबर 2017

ब्राह्मणों के खिलाफ आरोप हैं कि उसनें जाति का बटबारा किया !!

बहुत से लोग ब्राह्मणों के खिलाफ  गालियां लिख रहा था। उस मनहूस को ये पोस्ट समर्पित करता हूँ।

सवर्णों में एक जाति आती है ब्राह्मण...जिस पर सदियों से राक्षस, पिशाच, दैत्य, यवन, मुगल, अंग्रेज, कांग्रेस, सपा, बसपा, वामपंथी, भाजपा, सभी राजनीतिक पार्टियाँ, विभिन्न जातियाँ आक्रमण करते आ रहे हैं।

आरोप ये लगे कि ~ब्राह्मणों ने जाति का बँटवारा किया।

उत्तर - सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद जो अपौरुषेय है और जिसका संकलन वेद व्यास जी ने किया, जो मल्लाहिन के गर्भ से उत्पन्न हुए थे।

18 पुराण, महाभारत, गीता सब व्यास जी रचित है जिसमें वर्णव्यवस्था और जाति व्यवस्था दी गयी है। रचनाकार व्यास ब्राह्मण जाति से नही थे।

ऐसे ही कालीदास आदि कई कवि जो वर्णव्यवस्था और जातिव्यवस्था के पक्षधर थे जन्मजात ब्राह्मण नहीं थे।

अब मेरा प्रश्न उस वामपंथी के लिए...

कोई एक भी ग्रन्थ का नाम बताओ...
जिसमें जाति व्यवस्था लिखी गयी हो और उसे ब्राह्मण ने लिखा हो?

शायद एक भी नही मिलेगा।
मुझे पता है तुम मनु-स्मृति का ही नाम लोगे, जिसके लेखक मनु महाराज थे, जो कि क्षत्रिय थे।

मनु-स्मृति जिसे आपने कभी पढ़ा ही नही और पढ़ा भी तो टुकड़ों में कुछ श्लोकों को जिसके कहने का प्रयोजन कुछ अन्य होता है और हम समझते अपने विचारानुसार है।

मनु-स्मृति पूर्वाग्रह रहित होकर सांगोपांग पढ़े।
छिद्रान्वेषण की अपेक्षा गुणग्राही बनकर पढ़ने पर स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।

अब रही बात " ब्राह्मणों "ने क्या किया ? तो नीचे पढ़े...

(1)यन्त्रसर्वस्वम् (इंजीनियरिंग का आदि ग्रन्थ)- भारद्वाज

(2)वैमानिक शास्त्रम् (विमान बनाने हेतु)- आचार्य द्रोण

(3)सुश्रुतसंहिता (सर्जरी चिकित्सा)-सुश्रुत.

(4)चरकसंहिता (चिकित्सा)-चरक.

(5)अर्थशास्त्र (जिसमें सैन्यविज्ञान, राजनीति, युद्धनीति, दण्डविधान, कानून आदि कई महत्वपूर्ण विषय है)-कौटिल्य.

(6)आर्यभटीयम् (गणित)-आर्यभट्ट.

ऐसे ही छन्दशास्त्र, नाट्यशास्त्र, शब्दानुशासन,
परमाणुवाद, खगोल विज्ञान, योगविज्ञान सहित प्रकृति और मानव कल्याणार्थ समस्त विद्याओं का संचय अनुसंधान एवं प्रयोग हेतु ब्राह्मणों ने अपना पूरा जीवन भयानक जंगलों में, घोर दरिद्रता में बिताए।

उसके पास दुनियाँ के प्रपंच हेतु समय ही कहाँ शेष था?

कोई बताएगा समस्त विद्याओं में प्रवीण होते हुए भी, सर्वशक्तिमान् होते हुए भी ब्राह्मण ने पृथ्वी का भोग करने हेतु गद्दी स्वीकारा हो ?

एक गरेरिया के बेटे चन्द्रगुप्त को सम्राट बनाकर मौर्यवंश को स्थापित कर कुटिया बनाकर रहने वाले विष्णुगुप्त चाणक्य ब्राहमणों के सामने
जन्मते जायते शुद्र:
कर्मणे भवति ब्राह्मण:
वेदवाक्य को प्रतिस्थापित करता है.

विदेशी मानसिकता से ग्रसित कम्युनिस्टों(वामपंथियों) ने कुचक्र रचकर गलत तथ्य पेश किये। आजादी के बाद इतिहास संरचना इनके हाथों सौपी गयी और ये विदेश संचालित षड्यन्त्रों के तहत देश में जहर बोने लगे।

ब्राह्मण हमेशा ये चाहता रहा कि राष्ट्र शक्तिशाली हो, अखण्ड हो,न्याय व्यवस्था सुदृढ़ हो।

सर्वे भवन्तु सुखिन:सर्वे सन्तु निरामया:
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दु:खभाग्भवेत्...

का मन्त्र देने वाला ब्राह्मण,वसुधैव कुटुम्बकम् का पालन करने वाला ब्राह्मण, सर्वदा काँधे पर जनेऊ कमर में लंगोटी बाँधे एक गठरी में लेखनी, मसि, पत्ते, कागज और पुस्तक लिए चरैवेति-चरैवेति का अनुसरण करता रहा।मन में एक ही भाव था लोक कल्याण।

ऐसा नहीं कि लोक-कल्याण हेतु मात्र ब्राह्मणों ने ही काम किया। बहुत सारे ऋषि, मुनि, विद्वान्, महापुरुष अन्य वर्णों के भी हुए जिनका महत् योगदान रहा है।

किन्तु आज ब्राह्मण के विषय में ही इसलिए कह रहा हूँ कि जिस देश  की शक्ति के संचार में ब्राह्मणों के त्याग तपस्या का इतना बड़ा योगदान रहा।

जिसने मुगलों यवनों, अंग्रेजों और राक्षसी प्रवृत्ति के लोंगों का भयानक अत्याचार सहकर भी यहाँ की संस्कृति और ज्ञान को बचाए रखा।

वेदों शास्त्रों को जब जलाया जा रहा था,तब ब्राह्मणों ने पूरा का पूरा वेद और शास्त्र कण्ठस्थ करके बचा लिया और आज भी वो इसे नई पीढ़ी में संचारित कर रहे है वे सामान्य कैसे हो सकते है?

उन्हे सामान्य जाति का कहकर आरक्षण के नाम पर सभी सरकारी सुविधाओं से रहित क्यों रखा जाता है ?

ब्राह्मण अपनी रोजी रोटी कैसे चलाये ?
ब्राह्मण को देना पड़ता है पढ़ाई के लिए सबसे ज्यादा फीस और सरकारी सारी सुविधाएँ obc, sc, st, अल्पसंख्यक के नाम पर पूँजीपति या गरीब के नाम पर अयोग्य लोंगों को दी जाती है।

मैं अन्य जाति विरोधी नही हूँ...
 लेकिन, किसी ने ब्राह्मण को गाली देकर उकसाया है।

इस देश में गरीबी से नहीं जातियों से लड़ा जाता है।
एक ब्राह्मण के लिए सरकार कोई रोजगार नही देती कोई सुविधा नही देती।

एक ब्राह्मण बहुत सारे व्यवसाय नही कर सकता...
जैसे -- पोल्ट्रीफार्म, अण्डा, मांस, मुर्गीपालन,
कबूतरपालन, बकरी, गदहा,ऊँट, सूअरपालन, मछलीपालन, जूता,चप्पल, शराब आदि, बैण्डबाजा और विभिन्न जातियों के पैतृक व्यवसाय क्योंकि उसका धर्म एवं समाज दोनों ही इसकी अनुमति नही देते।

ऐसा करने वालों से उनके समाज के लोग सम्बन्ध नही बनाते।

वो शारीरिक-परिश्रम करके अपना पेट पालना चाहे तो उसे मजदूरी नही मिलती, क्योंकि लोग ब्राह्मण से सेवा कराना पाप समझते है।

हाँ...उसे अपना घर छोड़कर दूर मजदूरी, दरवानी आदि करने के लिए जाना पड़ता है। कुछ को मजदूरी मिलती है कुछ को नहीं...

अब सवाल उठता है कि ऐसा हो क्यों रहा है?
 जिसने संसार के लिए इतनी कठिन तपस्या की उसके साथ इतना बड़ा अन्याय क्यों?
जिसने शिक्षा को बचाने के लिए सर्वस्व त्याग दिया उसके साथ इतनी भयानक ईर्ष्या क्यों?

मैं बताना चाहूँगा कि  ब्राह्मण को किसी जाति-विशेष से द्वेष नही होता है।
उन्होंने शास्त्रों को जीने का प्रयास किया  है,अत: जातिगत छुआछूत को पाप मानते है।

मेरा सबसे निवेदन --गलत तथ्यों के आधार पर उन्हें क्यों सताया जा रहा है ?
उनके धर्म के प्रतीक शिखा और यज्ञोपवीत, वेश भूषा का मजाक क्यों बनाया जा रहा हैं ?

मन्त्रों और पूजा पद्धति का उपहास होता है और आप सहन कैसे करते है?

विश्व की सबसे समृद्ध और एकमात्र वैज्ञानिक भाषा संस्कृत को हम भारतीय हेय दृष्टि से क्यों देखते है? हमें पता है आप कुतर्क करेंगे, आजादी के बाद भी 74 साल से अत्याचार होता रहा ।

हर युग में ब्राह्मण के साथ भेदभाव, अत्याचार होता आया है...

 कुमार अवधेश सिंह के वाल से सहातयार्थ (साभार).

बुधवार, 30 अगस्त 2017

*प्रणाम का महत्व* !!

🙏 *प्रणाम का महत्व* 🙏

महाभारत का युद्ध चल रहा था -
एक दिन दुर्योधन के व्यंग्य से आहत होकर "भीष्म पितामह" घोषणा कर देते हैं कि -

"मैं कल पांडवों का वध कर दूँगा"

उनकी घोषणा का पता चलते ही पांडवों के शिविर में बेचैनी बढ़ गई -

भीष्म की क्षमताओं के बारे में सभी को पता था इसलिए सभी किसी अनिष्ट की आशंका से परेशान हो गए|

तब -

श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा अभी मेरे साथ चलो -

श्री कृष्ण द्रौपदी को लेकर सीधे भीष्म पितामह के शिविर में पहुँच गए -

शिविर के बाहर खड़े होकर उन्होंने द्रोपदी से कहा कि - अन्दर जाकर पितामह को प्रणाम करो -

द्रौपदी ने अन्दर जाकर पितामह भीष्म को प्रणाम किया तो उन्होंने -
"अखंड सौभाग्यवती भव" का आशीर्वाद दे दिया , फिर उन्होंने द्रोपदी से पूछा कि !!

"वत्स, तुम इतनी रात में अकेली यहाँ कैसे आई हो, क्या तुमको श्री कृष्ण यहाँ लेकर आये है" ?

तब द्रोपदी ने कहा कि -

"हां और वे कक्ष के बाहर खड़े हैं" तब भीष्म भी कक्ष के बाहर आ गए और दोनों ने एक दूसरे से प्रणाम किया -

भीष्म ने कहा -

"मेरे एक वचन को मेरे ही दूसरे वचन से काट देने का काम श्री कृष्ण ही कर सकते है"

शिविर से वापस लौटते समय श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि -

*"तुम्हारे एक बार जाकर पितामह को प्रणाम करने से तुम्हारे पतियों को जीवनदान मिल गया है "* -

*" अगर तुम प्रतिदिन भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य, आदि को प्रणाम करती होती और दुर्योधन- दुःशासन, आदि की पत्नियां भी पांडवों को प्रणाम करती होंती, तो शायद इस युद्ध की नौबत ही न आती "* -
......तात्पर्य्......

वर्तमान में हमारे घरों में जो इतनी समस्याए हैं उनका भी मूल कारण यही है कि -

*"जाने अनजाने अक्सर घर के बड़ों की उपेक्षा हो जाती है "*

*" यदि घर के बच्चे और बहुएँ प्रतिदिन घर के सभी बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लें तो, शायद किसी भी घर में कभी कोई क्लेश न हो "*

बड़ों के दिए आशीर्वाद कवच की तरह काम करते हैं उनको कोई "अस्त्र-शस्त्र" नहीं भेद सकता -

"निवेदन  सभी इस संस्कृति को सुनिश्चित कर नियमबद्ध करें तो घर स्वर्ग बन जाय।"

*क्योंकि*:-

*प्रणाम प्रेम है।*
*प्रणाम अनुशासन है।*
प्रणाम शीतलता है।            
प्रणाम आदर सिखाता है।
*प्रणाम से सुविचार आते है।*
प्रणाम झुकना सिखाता है।
प्रणाम क्रोध मिटाता है।
प्रणाम आँसू धो देता है।
*प्रणाम अहंकार मिटाता है।*
*प्रणाम हमारी संस्कृति है।*

गुरुवार, 12 मई 2016

मेरे स्नेही मित्रो कुछ दिनों से बिमार पर गया किसी गम्भीर रोग का शिकार हो गया हुँ,
 सुना हुँ दुआ में बहुत ताकत होती है अत आप सबो का आशीर्वाद का आशा रखता हुँ अगर आप  सबो का आशीर्वाद रहा और भगवान ने चाहा तो फिर मिलेंगे ...मेरे सभी चाहने वालो का मेरा प्रणाम ........

शुक्रवार, 25 मार्च 2016


शुक्रवार, 4 मार्च 2016

सुगौली संधि


सुगौली संधि , ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा के बीच हुई एक संधि है, जिसे 1814-16 के दौरान हुये ब्रिटिश-नेपाली युद्ध के बाद अस्तित्व में लाया गया था। इस संधि पर 2 दिसम्बर 1815 को हस्ताक्ष्रर किये गये और 4 मार्च 1816 का इसका अनुमोदन किया गया। नेपाल की ओर से इस पर राज गुरु गजराज मिश्र (जिनके सहायक चंद्र शेखर उपाध्याय थे) और कंपनी ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल पेरिस ब्रेडशॉ ने हस्ताक्षर किये थे। इस संधि के अनुसार नेपाल के कुछ हिस्सों को ब्रिटिश भारत में शामिल करने, काठमांडू में एक ब्रिटिश प्रतिनिधि की नियुक्ति और ब्रिटेन की सैन्य सेवा में गोरखाओं को भर्ती करने की अनुमति दी गयी थी, साथ ही इसके द्वारा नेपाल ने अपनी किसी भी सेवा में किसी अमेरिकी या यूरोपीय कर्मचारी को नियुक्त करने का अधिकार भी खो दिया। (पहले कई फ्रांसीसी कमांडरों को नेपाली सेना को प्रशिक्षित करने के लिए तैनात किया गया था)
संधि के तहत, नेपाल ने अपने भूभाग का लगभग एक तिहाई हिस्सा गंवा दिया जिसमे नेपाल के राजा द्वारा पिछ्ले 25 साल में जीते गये क्षेत्र जैसे कि पूर्व में सिक्किम , पश्चिम में
कुमाऊं और गढ़वाल राजशाही और दक्षिण में तराई का अधिकतर क्षेत्र शामिल था। तराई भूमि का कुछ हिस्सा 1816 में ही नेपाल को लौटा दिया गया। 1860 में तराई भूमि का एक बड़ा हिस्सा नेपाल को 1857 के भारतीय विद्रोह को दबाने में ब्रिटिशों की सहायता करने की एवज में पुन: लौटाया गया।
काठमांडू में तैनात ब्रिटिश प्रतिनिधि मल्ल युग के बाद नेपाल में रहने पहला पश्चिमी व्यक्ति था। (यह ध्यान देने योग्य है कि 18 वीं सदी के मध्य में गोरखाओं ने नेपाल पर विजय प्राप्ति के बाद बहुत से ईसाई धर्मप्रचारकों को नेपाल से बाहर निकाल दिया था)। नेपाल में ब्रिटिशों के पहले प्रतिनिधि, एडवर्ड गार्डनर को काठमांडू के उत्तरी हिस्से में तैनात किया गया था और आज यह स्थान लाज़िम्पाट कहलाता है और यहां ब्रिटिश और भारतीय दूतावास स्थित हैं। दिसम्बर 1923 में सुगौली संधि को अधिक्रमित कर "सतत शांति और मैत्री की संधि", में प्रोन्नत किया गया और ब्रिटिश निवासी के दर्जे को प्रतिनिधि से बढाकर दूत का कर दिया गया। 1950 में भारत (अब स्वतंत्र) और नेपाल ने एक नयी संधि पर दो स्वतंत्र देशों के रूप में हस्ताक्षर किए गए जिसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच संबंधों को एक नए सिरे से स्थापित करना था।
सुगौली संधि की शर्तें
ब्रिटिश-नेपाली युद्ध के बाद, नेपाल सरकार और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच शांति और मैत्री की एक संधि पर हस्ताक्षर किये गये। 2 दिसम्बर 1815 को इस संधि पर नेपाल सरकार की ओर से राज गुरु गजराज मिश्रा जिनके सहायक चंद्र शेखर उपाध्याय थे और कंपनी की ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल पेरिस ब्रेडशॉ द्वारा हस्ताक्षर किये गये। 4 मार्च 1816 को चंद्र शेखर उपाध्याय और जनरल डेविड ऑक्टरलोनी द्वारा मकवानपुर में संधि की हस्ताक्षरित प्रतियों का आदान प्रदान किया गया। संधि की शर्तें निम्नलिखित थीं: -
1- ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा के बीच सदैव शांति और मित्रता रहेगी।
2- नेपाल के राजा उन सभी भूमि दावों का परित्याग कर देंगे जो युद्ध से पहले दोनो राष्ट्रों के मध्य विवाद का विषय थे और उन भूमियों की संप्रभुता पर कंपनी के अधिकार को स्वीकार करेंगे।
3- नेपाल के राजा शाश्वत रूप से निम्न उल्लिखित सभी प्रदेशों को ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप देंगे:
(क) काली और राप्ती नदियों के बीच का सम्पूर्ण तराई क्षेत्र।
(ख) बुटवाल को छोडकर राप्ती और गंडकी के बीच का सम्पूर्ण तराई क्षेत्र।
(ग) गंडकी और कोशी के बीच का सम्पूर्ण तराई क्षेत्र जिस पर ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा अधिकार स्थापित किया गया है।
(घ) मेची और तीस्ता नदियों के बीच का सम्पूर्ण तराई क्षेत्र।
(च) मेची नदी के पूर्व के भीतर प्रदेशों का सम्पूर्ण पहाड़ी क्षेत्र। साथ ही पूर्वोक्त क्षेत्र गोरखा सैनिकों द्वारा इस तिथि से चालीस दिन के भीतर खाली किया जाएगा।
4- नेपाल के उन भरदारों और प्रमुखों, जिनके हित पूर्वगामी अनुच्छेद (क्रमांक ३) के अनुसार उक्त भूमि हस्तांतरण द्वारा प्रभावित होते हैं, की क्षतिपूर्ति के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी, 2 लाख रुपये की कुल राशि पेंशन प्रतिवर्ष के रूप में देने को तैयार है जिसका निर्णय नेपाल के राजा द्वारा लिया जा सकता है।
5- नेपाल के राजा, उनके वारिस और उत्तराधिकारी काली नदी के पश्चिम में स्थित सभी देशों पर अपने दावों का परित्याग करेंगे और उन देशों या उनके निवासियों से संबंधित किसी मामले में स्वयं को सम्मिलित नहीं करेंगे।
6- नेपाल के राजा, सिक्किम के राजा को उनके द्वारा शासित प्रदेशों के कब्जे के संबंध में कभी परेशान करने या सताने की किसी भी गतिविधि में संलग्न नहीं होंगे। यदि नेपाल और सिक्किम के बीच कोई विवाद होता है तो उसे ईस्ट इंडिया कंपनी की मध्यस्थता के लिए भेजा जाएगा।
7- एतद्द्वारा नेपाल के राजा, ब्रिटिश सरकार की सहमति के बिना किसी भी ब्रिटिश, अमेरिकी या यूरोपीय नागरिक को अपनी किसी भी सेवा में ना तो नियुक्त करेंगे ना ही उसकी सेवाओं को बनाये रखेंगे।
8- एतद्द्वारा नेपाल और ब्रिटेन (ईस्ट इंडिया कंपनी) के बीच स्थापित शांति और सौहार्द के संबंधों की सुरक्षा और उनमें सुधार के उद्देश्य से, यह सहमति बनती है कि एक का मान्यता प्राप्त मंत्री, दूसरे की अदालत में रहेगा।
9- इस संधि का अनुमोदन नेपाल के राजा द्वारा इस तारीख से 15 दिनों के भीतर किया जाएगा और उसे लेफ्टिनेंट कर्नल ब्रेडशॉ को सौंपा जाएगा, जो उसे अगले 20 दिनों में या उससे पहले (यदि साध्य हो), गवर्नर जनरल से अनुमोदित करा कर राजा को सुपुर्द करेंगे।
वास्तव में, सुगौली संधि, ईस्ट इंडिया कंपनी के पक्ष में थी और इसके द्वारा नेपाल को अपने भूभाग का एक बड़ा हिस्सा गंवाना पड़ा था। इसलिए इसके बाद दिसम्बर 1816 में एक उत्तरगामी समझौते पर सहमति बनी जिसके अनुसार नेपाल को मेची नदी के पूर्व और
महाकाली नदी के पश्चिम के बीच का तराई क्षेत्र वापस लौटा दिया गया। इस समझौते के फलस्वरूप दो लाख रुपए प्रतिवर्ष की क्षतिपूर्ति राशि के प्रावधान को समाप्त कर दिया गया। एक भूमि सर्वेक्षण के द्वारा दोनों राष्ट्रों के बीच की सीमा को तय करने का प्रस्ताव भी स्वीकार किया गया था।
सुगौली संधि और मिथिला
संधि की वैधता
1. संधि के अनुच्छेद 9 के अनुसार संधि का अनुमोदन नेपाल के राजा द्वारा होना अनिवार्य था, लेकिन राजा गीर्वान युद्ध बिक्रम शाह द्वारा अनुमोदित संधि का अभिलेख निर्णायक रूप से नहीं मिलता है।
2. ब्रिटिशों को डर था कि नेपाल शायद, चंद्रशेखर उपाध्याय द्वारा 4 मार्च 1816 को हस्ताक्षरित संधि को लागू न करे। इसलिए, गवर्नर जनरल डेविड ऑक्टरलोनी ने ब्रिटिश सरकार की ओर से संधि की पुष्टि उसी दिन की और समकक्ष संधि को उपाध्याय को सौंप दिया।
3. कुछ लोगों कहना है कि चूंकि संधि, नेपाली राजशाही और अंग्रेजों के बीच हुई थी इसलिए इसे नेपाल गणराज्य और भारत गणराज्य के मध्य लागू नहीं किया जा सकता।
सीमा विवाद
क्योंकि इस संधि में राष्ट्रीय परिसीमन को स्पष्ट नहीं किया गया था, इसलिए इसके प्रभाव आज तक कायम है:
1. संधि यह बताने में विफल रही है कि कुछ स्थानों पर एक स्पष्ट वास्तविक सीमा रेखा कहां से गुजरेगी। कई स्थानों पर सीमा के निर्धारण और सीमा स्तंभों की स्थापना को लेकर विवाद है। अनुमान लगाया गया है ऐसे विवादित स्थानों का क्षेत्रफल लगभग 60,000 हेक्टेयर है। ऐसे कई क्षेत्रों में दोनो ओर से अब भी दावे, प्रतिदावे किये जा रहे हैं, जिन पर विचार-विमर्श, विवादों और तर्कों का दौर जारी है।
2. नतीजा यह है कि आज भी नेपाल-भारत की सीमा रेखा के 54 स्थानों पर अतिक्रमण और विवादों के आरोप हैं। प्रमुख क्षेत्रों में कालापानी-लिम्पियाधुरा, सुस्ता, मेची क्षेत्र, टनकपुर, सन्दकपुर, पशुपतिनगर हिले थोरी आदि स्थानों की पहचान की गई है।
1795 में ब्रिटिश भारत और नेपाल। आज भी यही सीमायें हैं।
1805 का यह नक्शा नेपाल के उस विस्तार दर्शाता है, जो भारतीय रियासतों को परास्त कर प्राप्त हुआ था। इसके परिणामस्वरूप नेपाल की पश्चिमी सीमा कांगड़ा के निकट सतलुज नदी तक पहुंच गयी थी। सुगौली संधि के कारण यह भाग भारत को वापस मिले।
दो साल लंबे चले ब्रिटिश- नेपाली युद्ध को खत्म करने के लिए 1816 में, ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल की गोरखा राजशाही ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इस संधि के तहत, मिथिला क्षेत्र का एक हिस्सा भारत से अलग होकर नेपाल के अधिकार क्षेत्र में चला गया। [1] इस भाग को नेपाल में, पूर्वी तराई या मिथिला कहा जाता था। [2]
सुगौली संधि के बाद से, नेपाल मिथिला (गौण भाग) के उत्तरी भागों पर नियंत्रण रखता है, जबकि दक्षिणी भाग (मुख्य भाग) भारत के नियंत्रण में हैं।
सुगौली संधि से पहले तक
सुगौली संधि के अस्तित्व में आने तक, पूर्व में
दार्जिलिंग और तिस्ता, दक्षिण-पश्चिम में
नैनीताल और पश्चिम में कुमाऊं राजशाही, गढ़वाल राजशाही और बाशहर जैसे क्षेत्र नेपाल के अधीन आते थे। इन क्षेत्रों पर नेपाल ने पिछले लगभग 25 वर्षों के दौरान विजय प्राप्त की थी, जिन्हें संधि के बाद भारत को वापस लौटाया गया।
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निश्चय ही इस लेख में मिथिला की कहीं कोई चर्चा नही है मगर इस संधि का सबसे बुरा प्रभाव मिथिला पर पड़ा है और आज मिथिला दोनो देशों में उपेक्षित है।
एसा हो नही सकता कि अब फिर एक हो मगर हम इतना जरुर कर सकते हैं कि अपनी संस्कृति की रक्षा करें और इतिहास के इस काले पन्ने के साथ जो सच्चाई है वो सार्वजनिक कर नव मिथिला निर्माण , भारत और नेपाल दोनो जगह करवाने में योगदान करें।


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जय मिथिला
जय जय मैथिल

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

मजेदार मस्तीभरे दोहे:🌞

कर्ज़ा देता मित्र को, वह मूर्ख कहलाए,
महामूर्ख वह यार है, जो पैसे लौटाए… 
**************
बिना जुर्म के पिटेगा, समझाया था तोय,
पंगा लेकर पुलिस से, साबित बचा न कोय…
*******************
गुरु पुलिस दोऊ खड़े, काके लागूं पाय,
तभी पुलिस ने गुरु के, पांव दिए तुड़वाय…
*****************
नेता को कहता गधा, शरम न तुझको आए,
कहीं गधा इस बात का, बुरा मान न जाए…
************************
बूढ़ा बोला, वीर रस, मुझसे पढ़ा न जाए,
कहीं दांत का सैट ही, नीचे न गिर जाए…😬
**********
हुल्लड़ खैनी खाइए, इससे खांसी होय,
फिर उस घर में रात को, चोर घुसे न कोय…
***************
हुल्लड़ काले रंग पर, रंग चढ़े न कोय,
लक्स लगाकर कांबली, तेंदुलकर न होय…
*****************
बुरे समय को देखकर, गंजे तू क्यों रोय,
किसी भी हालत में तेरा, बाल न बांका होय…
******************
दोहों को स्वीकारिये, या दीजे ठुकराय,
जैसे मुझसे बन पड़े, मैंने आगे दिए सरकाय…
.

बहुत ही सुंदर पंक्तियां ....


जब भी अपनी शख्शियत पर अहंकार हो,

एक फेरा शमशान का जरुर लगा लेना।
और....

जब भी अपने परमात्मा से प्यार हो,

किसी भूखे को अपने हाथों से खिला देना।

जब भी अपनी ताक़त पर गुरुर हो,

एक फेरा वृद्धा आश्रम का लगा लेना।
और….
जब भी आपका सिर श्रद्धा से झुका हो,

अपने माँ बाप के पैर जरूर दबा देना।

जीभ जन्म से होती है और मृत्यु तक रहती है क्योकि वो कोमल होती है.

दाँत जन्म के बाद में आते है और मृत्यु से पहले चले जाते हैं...

 क्योकि वो कठोर होते है।

छोटा बनके रहोगे तो मिलेगी हर

बड़ी रहमत...

बड़ा होने पर तो माँ भी गोद से उतार

देती है..

किस्मत और पत्नी

भले ही परेशान करती है लेकिन

जब साथ देती हैं तो

ज़िन्दगी बदल देती हैं.।।

"प्रेम चाहिये तो समर्पण खर्च करना होगा।

विश्वास चाहिये तो निष्ठा खर्च करनी होगी।

साथ चाहिये तो समय खर्च करना होगा।

किसने कहा रिश्ते मुफ्त मिलते हैं ।

मुफ्त तो हवा भी नहीं मिलती ।

एक साँस भी तब आती है,

जब एक साँस छोड़ी जाती है!!"?.: 

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नंगे पाँव चलते “इन्सान” को लगता है

कि “चप्पल होते तो क अच्छा होता”

बाद मेँ……….

“साइकिल होती तो कितना अच्छा होता”

उसके बाद में………

“मोपेड होता तो थकान नही लगती”

बाद में………

“मोटर साइकिल होती तो बातो-बातो मेँ

रास्ता कट जाता”

फिर ऐसा लगा की………

“कार होती तो धूप नही लगती”
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फिर लगा कि,

“हवाई जहाज होता तो इस ट्रैफिक का झंझट

नही होता”

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जब हवाई जहाज में बैठकर नीचे हरे-भरे घास के मैदान

देखता है तो सोचता है,

कि “नंगे पाव घास में चलता तो दिल

को कितनी “तसल्ली” मिलती”…..
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” जरुरत के मुताबिक “जिंदगी” जिओ – “ख्वाहिश”….. के

मुताबिक नहीं………
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क्योंकि ‘जरुरत’

तो ‘फकीरों’ की भी ‘पूरी’ हो जाती है, और

‘ख्वाहिशें’….. ‘बादशाहों ‘ की भी “अधूरी” रह जाती है”…..
🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀
“जीत” किसके लिए, ‘हार’ किसके लिए

‘ज़िंदगी भर’ ये ‘तकरार’ किसके लिए…
🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱
जो भी ‘आया’ है वो ‘जायेगा’ एक दिन

फिर ये इतना “अहंकार” किसके लिए…
🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱
🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀
ए बुरे वक़्त !

ज़रा “अदब” से पेश आ !!

“वक़्त” ही कितना लगता है

“वक़्त” बदलने में………
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मिली थी ‘जिन्दगी’ , किसी के

‘काम’ आने के लिए…..

पर ‘वक्त’ बीत रहा है , “कागज” के “टुकड़े” “कमाने” के लिए………
🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀🌱🍀 , forwad to all
family and friends. .

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016


रविवार, 7 फ़रवरी 2016

यदि कबीर जिन्दा होते तो आजकल के दोहे यह होते :-


🔹��नयी सदी से मिल रही, दर्द भरी सौगात!

बेटा कहता बाप से, तेरी क्या औकात!!

��पानी आँखों का मरा, मरी शर्म औ लाज!

कहे बहू अब सास से, घर में मेरा राज!!

��भाई भी करता नहीं, भाई पर विश्वास!

बहन पराई हो गयी, साली खासमखास!!

��मंदिर में पूजा करें, घर में करें कलेश!

बापू तो बोझा लगे, पत्थर लगे गणेश!!

��बचे कहाँ अब शेष हैं, दया, धरम, ईमान!

पत्थर के भगवान हैं, पत्थर दिल इंसान!!

��पत्थर के भगवान को, लगते छप्पन भोग!

मर जाते फुटपाथ पर, भूखे, प्यासे लोग!!

��फैला है पाखंड का, अन्धकार सब ओर!

पापी करते जागरण, मचा-मचा कर शोर!

��पहन मुखौटा धरम का, करते दिन भर पाप!

भंडारे करते फिरें, घर में भूखा बाप !



�� प्रेम भाव सब मिट गया, टूटे रीति-रिवाज.



II श्री सरस्वत्यै नमः II

II श्री सरस्वत्यै नमः II
ॐ शुक्लांब्रह्मविचारसार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं I वीणापुस्तक धारिणींमभयदां जाड्यान्ध्कारापहाम् II हस्तेस्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मसनेसंस्थितां I वन्देतांपरमेश्वरींभगवतीं बुद्धिप्रदाम शारदाम् II

माछक महत्व


हरि हरि ! जनम कि‌ऎक लेल ?
रोहु माछक मूड़ा जखन पैठ नहि भेल ?
मोदिनीक पल‌इ तरल जीभ पर ने देल !
घृत महँक भुजल कब‌इ कठमे ने गेल !
लाल-लाल झिंगा जखन दाँ तर ने देल !
माडुरक झोर सँ चरणामृत ने लेल !
माछक अंडा लय जौं नौवौद्य नहि देल !
माछे जखन छाड़ि देब, खा‌एब की बकलेल!
सागेपात चिबैबक छल त जन्म कि‌ऎ लेल !
हरि हरि.



पग पग पोखैर पान मखान , सरस बोल मुस्की मुस्कान, बिद्या बैभव शांति प्रतिक, ललित नगर दरभंगा थिक l

कर भला तो हो भला अंत भले का भला

समस्त मिथिलांचल वासी स निवेदन अछि जे , कुनू भी छेत्र मै विकाश के जे मुख्य पहलू छै तकर बारे मै बिस्तार स लिखैत" और ओकर निदान सेहो , कोनो नव जानकारी या सुझाब कोनो भी तरहक गम्भीर समस्या रचना ,कविता गीत-नाद हमरा मेल करू हमअहांक सुझाब नामक न्यू पेज मै नामक और फोटो के संग प्रकाशित करब ज्ञान बाटला स बढैत छै और ककरो नया दिशा मिल जायत छै , कहाबत छै दस के लाठी एक के बोझ , तै ककरो बोझ नै बनै देवे .जहा तक पार लागे एक दोसर के मदत करी ,चाहे जाही छेत्र मै हो ........

अहांक स्वागत अछि.अहां सभ अपन विचार... सुझाव... कमेंट(मैथिली या हिन्दी मै ) सं हमरा अवगत कराउ.त देर नहि करु मन मे जे अछि ओकरा लिखि कs हमरा darbhangawala@gmail.com,lalan3011@gmail.com पर भेज दिअ-एहि मेल सं अहां अपन विचार... सुझाव... कमेंट सं हमरा अवगत कराउ. सम्पर्क मे बनल रहुं. ..........

एकता विकास के जननी छै

जय मैथिली, जय मिथिला, जय मिथिलांचल (बिहार)


अहाँ अपन अमूल्य समय जे हमर ब्लॉग देखै में देलो तही लेल बहुत - बहुत धन्यवाद... !! प्रेम स कहू" जय मैथिली, जय मिथिला, जय मिथिलांचल(बिहार),जय श्यामा माई -

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